कृमि, कवक जनित रोग एवं नियंत्रण - परीक्षा उपयोगी नोट्स
कृमि जनित रोग (Helminthic Diseases)
1. ऐस्केरिसता (Ascariasis):
रोगजनक (Pathogen) [BSEB 2022]: सामान्य आंत्र परजीवी गोलकृमि ऐस्कारिस (Ascaris lumbricoides) मनुष्य के लिए रोगजनक है।
लक्षण (Symptoms): इस रोग में आंतरिक रक्तस्राव (Internal bleeding), पेशीय पीड़ा (Muscular pain), ज्वर (Fever), अरक्तता (Anemia) और आंत्र का अवरोध (Blockage of intestinal passage) होता है।
संचरण (Transmission): इस परजीवी के अंडे संक्रमित व्यक्ति के मल के साथ बाहर आते हैं और मिट्टी, जल तथा पौधों को संदूषित कर देते हैं। स्वस्थ व्यक्ति में संक्रमण संदूषित पानी, शाक-सब्जियों और फलों के सेवन से होता है।
2. फाइलेरिया / हस्तिपाद (Filariasis / Elephantiasis):
रोगजनक (Pathogen) [BSEB 2009, 2012, 2013, 2014, 2021, 2025, 2026]: यह अत्यंत दर्दनाक रोग वुचेरेरिया बैंक्रोफ्टाई (Wuchereria bancrofti) और वु. मैलाई (W. malayi) नामक फाइलेरिआई कृमि द्वारा होता है।
प्रभावित अंग (Affected Organ): ये कृमि प्रायः निचले अंगों (अर्धः पाद) की लसीका वाहिकाओं (Lymphatic vessels) में कई वर्षों तक रहते हैं। जननिक अंग (Genital organs) भी अक्सर प्रभावित हो जाते हैं।
लक्षण (Symptoms): अंगों में धीरे-धीरे बढ़ने वाला दीर्घकालिक शोथ (Chronic inflammation) होता है, जिससे पैरों और अंगों में भारी विरूपता (Deformity) आ जाती है, जिसे हाथी पाँव (Elephantiasis) कहते हैं।
फाइलेरिया (हाथी पाँव) बीमारी में, शरीर के अंगों (खासकर पैरों) में लंबे समय तक बनी रहने वाली सूजन होती है। धीरे-धीरे यह सूजन इतनी बढ़ जाती है कि अंगों का आकार पूरी तरह बदल जाता है और वे असामान्य रूप से मोटे और बेडौल (Deformed) हो जाते हैं। इसी बिगड़े हुए आकार वाली स्थिति को ही 'हाथी पाँव' (Elephantiasis) कहा जाता है।
संचरण वाहक (Vector): इसका संचारण संक्रमित मादा मच्छर (मुख्यतः Culex प्रजाति) के काटने से होता है।
सार्वजनिक स्वास्थ्य परिप्रेक्ष्य (बिहार): कुकरौन और बेगूसराय सहित पूरे बिहार (Bihar) राज्य में लिम्फैटिक फाइलेरियासिस (LF) एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या रही है। हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की रिपोर्ट के अनुसार, बिहार ने जन औषधि प्रशासन (Mass Drug Administration - MDA) और प्रत्यक्ष प्रेक्षित उपचार (Directly Observed Treatment - DOT) के माध्यम से ऐतिहासिक सफलता प्राप्त की है। अररिया, मधेपुरा, सुपौल और किशनगंज जैसे जिलों ने ट्रांसमिशन असेसमेंट सर्वे (Transmission Assessment Survey - TAS 1) को सफलतापूर्वक पार कर लिया है, जो दर्शाता है कि यहाँ संक्रमण की दर सुरक्षित स्तर से नीचे आ गई है।
कवक जनित रोग (Fungal Diseases)
दाद (Ringworm):
रोगजनक (Pathogen) [BSEB 2022]: माइक्रोस्पोरम (Microsporum), ट्राइकोफाइटॉन (Trichophyton), और एपिडर्मोफाइटॉन (Epidermophyton) वंश के अनेक कवक दाद के लिए उत्तरदायी हैं।
लक्षण (Symptoms): शरीर के विभिन्न भागों जैसे—त्वचा (Skin), नाखून (Nails) और शिरोवल्क (Scalp) पर सूखी, शल्की विक्षतियाँ (Dry, scaly lesions) प्रकट होती हैं, जिनमें तेज खुजली (Itching) होती है।
'Scalp' का उल्लेख दाद (Ringworm) बीमारी के संदर्भ में आया है। दाद पैदा करने वाले कवक (Fungi) अक्सर शरीर के अलग-अलग हिस्सों में फैलते हैं, जिसमें से 'Scalp' (सिर की त्वचा) भी एक मुख्य जगह है। जब कवक सिर की त्वचा पर संक्रमण फैलाते हैं, तो वहाँ सूखी और पपड़ीदार त्वचा (scaly lesions) हो जाती है और बहुत खुजली होती है।
अनुकूल परिस्थितियाँ: ऊष्मा (Heat) और नमी (Moisture) इन कवकों को त्वचा के वलनों (Skin folds) जैसे- ग्रोइन अथवा पैर की उंगलियों के बीच पनपने में अत्यधिक मदद करते हैं।
दाद (Ringworm) पैदा करने वाले कवक (Fungi) को बढ़ने के लिए गर्मी और नमी बहुत पसंद है। हमारे शरीर के वे हिस्से जहाँ त्वचा एक-दूसरे के ऊपर मुड़ती है या आपस में रगड़ खाती है, वहाँ पसीना और गर्मी ज्यादा जमा होती है।
उदाहरण के लिए:
- त्वचा के वलन (Skin folds): जैसे बगल (Armpits) या जांघों के बीच का हिस्सा (Groin)।
- पैर की उंगलियों के बीच: यह जगह भी अक्सर पसीने के कारण नम रहती है।
निष्कर्ष: चूँकि इन जगहों पर गर्मी और नमी बनी रहती है, इसलिए कवक (Fungi) को यहाँ पनपने या फैलने का सबसे अच्छा मौका मिलता है। इसीलिए इन हिस्सों को साफ और सूखा रखना संक्रमण से बचने के लिए बहुत जरूरी है।
संचरण (Transmission): दाद आमतौर पर मिट्टी (Soil) के संपर्क से, या संक्रमित व्यक्तियों के तौलिए, कपड़े या कंघे का प्रयोग करने से तेजी से फैलता है।
संक्रामक रोगों का निरोध और नियंत्रण (Prevention and Control) [BSEB 2015]
संक्रामक रोगों के विरुद्ध रक्षा उपायों के रूप में व्यक्तिगत तथा जन स्वच्छता (Public health measures) अत्यंत महत्त्वपूर्ण है:
व्यक्तिगत स्वच्छता (Personal Hygiene): शरीर को साफ रखना, स्वच्छ पेयजल, और ताजे फलों/सब्जियों का सेवन।
जन स्वास्थ्य (Public Hygiene): अपशिष्ट पदार्थों (Waste) और मल-मूत्र का समुचित निपटान, जलाशयों की नियमित सफाई और विसंक्रमण।
- अपशिष्ट और मल-मूत्र का समुचित निपटान: कचरे (कूड़े) और मानव मल-मूत्र को खुले में न छोड़ना, बल्कि उन्हें सही तरीके से सीवर या बंद पाइपलाइन के जरिए ठिकाने लगाना, जिससे टाइफॉइड और हैजा जैसी बीमारियाँ न फैलें।
- जलाशयों की नियमित सफाई: तालाबों, टैंकों या पानी जमा होने वाली जगहों को साफ रखना ताकि मच्छर न पनप सकें।
- विसंक्रमण (Disinfection): कीटाणुनाशक दवाओं (जैसे ब्लीच या फिनाइल) का उपयोग करके उन जगहों को कीटाणुओं से मुक्त करना।
निष्कर्ष: यह सब इसलिए किया जाता है ताकि हमारे आसपास का वातावरण कीटाणु-मुक्त (germ-free) रहे और बीमारियों का प्रसार समाज में न हो पाए।
वायुवाहित रोग नियंत्रण: न्युमोनिया और जुकाम जैसे रोगों से बचने के लिए संक्रमित व्यक्तियों और उनके सामान के निकट संपर्क से बचना चाहिए।
रोगवाहक नियंत्रण (Vector Control): मलेरिया और डेंगू जैसे रोगों को रोकने के लिए मच्छरों के प्रजनन स्थलों को नष्ट करना आवश्यक है। आवासीय क्षेत्रों में पानी जमा न होने देना, कूलर की सफाई, मच्छरदानी का उपयोग, और गंबुजिया (Gambusia) जैसी मछलियों को तालाबों में डालना जो मच्छर के लार्वा को खा जाती हैं, अति प्रभावकारी उपाय हैं।